किरोड़ीमल कॉलेज में हुआ ‘विभाजन विभीषिका की कहानियां’ पुस्तक पर परिचर्चा का आयोजन
अब खत्म हो रही है वह पीढ़ी जिसने विभाजन को प्रत्यक्ष रूप से देखा था: डॉ. सच्चिदानंद जोशी
विभाजन विभीषिका की बात इसलिए जरूरी ताकि नयी पीढ़ी सचेत रहे और ऐसा दोबारा ना हो: अनूप लाठर
विभाजन को केवल भौगोलिक सीमाओं का नहीं, बल्कि मानवीय भावनाओं और रिश्तों का बंटवारा था: प्रो. दिनेश खट्टर
नई दिल्ली, 24 मार्च।
दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कॉलेज में ‘विभाजन विभीषिका की कहानियां’ पुस्तक पर एक अत्यंत विचारोत्तेजक एवं संवेदनशील परिचर्चा का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम किरोड़ीमल कॉलेज एवं सेंटर फॉर इंडिपेंडेंस एंड पार्टीशन स्टडीज, दिल्ली विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित हुआ। कार्यक्रम में प्राचार्य प्रो. दिनेश खट्टर के साथ मुख्य अतिथि के रूप में डॉ. सच्चिदानंद जोशी (सदस्य सचिव, आईजीएनसीए) उपस्थित रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता श्री अनूप लाठर (अध्यक्ष, कल्चर काउंसिल) नी की।
इस अवसर पर बतौर विशिष्ट अतिथि प्रो. रवि प्रकाश टेकचंदानी (अध्यक्ष, सीआईपीएस) एवं प्रो. रविंदर कुमार (निदेशक, सीआईपीएस) मंचासीन रहे। कॉलेज के विवेकानंद ऑडिटोरियम में 23 मार्च को सांय काल में आयोजित इस कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्य अतिथि डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने अपने संबोधन में विभाजन की स्मृतियों के क्षीण होते जाने पर चिंता व्यक्त की। डॉ. जोशी ने कहा कि आज पचहत्तर साल बाद वह पीढ़ी खत्म हो रही है जिसने विभाजन को प्रत्यक्ष रूप से देखा था, उनकी याददाश्त कमज़ोर हो रही है लेकिन उनके ज़ख्म हरे हैं, घाव हरे हैं। नए समय में उन्होंने अपने को समय के अनुसार ढाल लिया है लेकिन जब भी आप उनकी किसी बुजुर्ग पीढ़ी से बात करते हैं तो उनकी आँखों में तुरंत आंसू आ जाते हैं।
अध्यक्षीय वक्तव्य के दौरान डीयू कल्चर काउंसिल के अध्यक्ष अनूप लाठर ने कहा कि हमें दुख नहीं याद करना चाहिए, लेकिन उसका कारण और परिणाम जरूर याद रखना चाहिए। आज हम विभाजन विभीषिका की बात करते हैं ताकि हमारी नयी पीढ़ी सचेत रहे और उसके साथ ऐसा दोबारा ना हो। कार्यक्रम के शुभारंभ अवसर पर कॉलेज के प्राचार्य प्रो. दिनेश खट्टर के स्वागत वक्तव्य प्रस्तुत किया। उन्होंने विभाजन को केवल भौगोलिक सीमाओं का नहीं, बल्कि मानवीय भावनाओं और रिश्तों का बंटवारा बताते हुए इसे इतिहास की एक गहन और पीड़ादायक घटना के रूप में रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि यह विषय अपने आप में हृदय को झकझोर देने वाला है। यह बटवारा केवल जमीन का नहीं, बल्कि दिलों का बटवारा था और यह मानवता की एक कठिन परीक्षा थी।
सीआईपीएस के निदेशक प्रो. रविंदर कुमार ने अपनी प्रारंभिक टिप्पणी में बताया कि विभाजन के 75 वर्ष बाद भी विभाजन को झेलने वाले लोगों की पीड़ा और दुख पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं। विभाजन के कारण क्या थे? विभाजन किसकी महत्वाकांक्षा का परिणाम था? और विभाजन से कितना नुकसान हुआ? इस विषय में सरकारी स्तर पर कभी भी कोई ठोस प्रयास नहीं किए गए। उन्होंने वर्तमान सरकार तथा प्रो. योगेश सिंह, कुलपति, दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा इस दिशा में किए जा रहे प्रयासों की सराहना भी की। प्रो. कुमार ने पिछले दो वर्षों के दौरान सीआईपीएस की गतिविधियों की रिपोर्ट भी प्रस्तुत की। इसी क्रम में प्रो. रवि प्रकाश टेकचंदानी ने विभाजन साहित्य के गंभीर अकादमिक अध्ययन की आवश्यकता पर प्रकाश डालते हुए इसे ऐतिहासिक समझ के लिए एक महत्वपूर्ण स्रोत बताया। इस दौरान किताब से तीन चयनित कहानियों का पाठ भी किया गया।
इस परिचर्चा ने समकालीन परिप्रेक्ष्य में विभाजन की त्रासदी की प्रासंगिकता को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। कार्यक्रम में विद्यार्थियों, शिक्षकों एवं शोधार्थियों की सक्रिय भागीदारी रही। वक्ताओं ने विभाजन के सामाजिक, ऐतिहासिक और भावनात्मक आयामों पर गहन विचार साझा किए, जिससे उपस्थित श्रोताओं को इतिहास को अधिक व्यापक, मानवीय और संवेदनशील दृष्टिकोण से समझने का अवसर प्राप्त हुआ। समग्र रूप से यह कार्यक्रम विभाजन की स्मृतियों को सहेजने, संवाद को सशक्त बनाने और नयी पीढ़ी को इतिहास के प्रति जागरूक करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण एवं सार्थक हस्तक्षेप सिद्ध हुआ। कार्यक्रम का संचालन प्रो. ज्योति त्रेहन शर्मा (संयुक्त निदेशक, सीआईपीएस) ने किया। डॉ. गौरव पंवार और डॉ. स्वाति सोम ने इस कार्यक्रम में बतौर समन्वयक व सह-समन्वयक भूमिका निभाई। इस परिचर्चा का उद्देश्य भारत के विभाजन से जुड़ी मानवीय त्रासदी, व्यक्तिगत अनुभवों और अब तक अनकही रह गई कहानियों को संवाद के माध्यम से सामने लाना था।

