सीयूईटी के बाद ज्यादा पारदर्शी और जवाबदेह हो गई है दाखिला प्रक्रिया: प्रो. योगेश सिंह
कम से कम राउंड में सीटों के बेहतर आवंटन के लिए कालेजों को दी सीट मैट्रिक्स पर फिर से विचार करने की दी है सलाह
नई दिल्ली, 17 दिसंबर।
दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. योगेश सिंह ने कहा कि सीयूईटी आने के बाद विश्वविद्यालय की दाखिला प्रक्रिया केंद्रीकृत सिस्टम के साथ अधिक तार्किक, पारदर्शी और जवाबदेह हो गई है। अब हर स्टेकहोल्डर को हर सीट की स्थिति के बारे में पता होता है। दिल्ली विश्वविद्यालय के सीएसएएस एडमिशन सिस्टम में, हर आवंटन को सार्वजनिक किया जाता है, जिसके लिए बहुत ही वैज्ञानिक तरीका अपनाया जाता है। कुलपति ने कहा कि कम से कम राउंड में सीटों के बेहतर आवंटन के लिए कॉलेजों को अपनी सीट मैट्रिक्स पर फिर से विचार करने की सलाह दी गई है।
डीयू के कुछ कॉलेजों में स्नातक प्रोग्रामों में खाली सीटों को लेकर कुलपति ने स्पष्ट किया कि यह सीयूईटी के कारण नहीं है। प्रो. योगेश सिंह ने डीयू की दाखिला शाखा के आंकड़ों के आधार पर स्पष्ट किया कि सीयूईटी से पहले जब दाखिले 12वीं कक्षा में मिले अंकों के आधार पर होते थे, तब भी कुछ सीटें खाली रह जाती थीं। उन्होंने 2018, 2019 (सीयूईटी से पहले/कोविड से पहले) और 2024, 2025 (कोविड के बाद) के दाखिलों के आंकड़ों के साथ बताया कि 2019 में मेरिट आधारित दाखिलों के समय डीयू में स्नातक की कुल उपलब्ध 70735 सीटों में से 68213 ही भरी गई थी, और 3.56% सीटें खाली रही थीं। इस बार 2025 में सीयूईटी आधारित दाखिलों के समय कुल उपलब्ध 71642 सीटों के मुक़ाबले 72229 दाखिले हुए हैं। इस प्रकार 0.65% दाखिले अधिक हुए हैं।
कुलपति ने कहा कि 2019 में, कुल 3.56% सीटें खाली थीं, जबकि पिछले कुछ सालों में, 2025 में, दाखिले स्वीकृत संख्या से ज़्यादा हुए हैं। तुलना से यह भी पता चलता है कि सीयूईटी से पहले दाखिलों को अनिश्चित कट-ऑफ के कारण नियंत्रित नहीं किया जा सकता था। ऐसे भी मामले सामने आए हैं जहाँ 11 सीटों की क्षमता पर 203 दाखिले किए गए, जो कि तय सीटों से 1745% अधिक थे। नए सिस्टम से अब अधिक और कम दाखिलों की समस्या नियंत्रित और प्रबंधित की जा सकती है। अब कॉलेज तय करते हैं कि वे हर कोर्स में कितनी अतिरिक्त सीटें देना चाहते हैं। यह डेटा सिस्टमैटिक प्रोसेस के लिए एल्गोरिदम में डाला जाता है। यूनिवर्सिटी अब प्रोग्राम की लोकप्रियता पर अनुमानित विश्लेषण कर सकती है, जिससे दाखिला नीति बनाने में मदद मिलती है।
कुलपति ने कहा कि दाखिलों के डेटा का तुलनात्मक गहन विश्लेषण करने से पता चलता है कि सीयूईटी से पहले कट-ऑफ सिस्टम में उन सभी उम्मीदवारों को दाखिला दिया जाता था जो कॉलेज द्वारा घोषित कट-ऑफ को पूरा करते थे। इससे यह पता चलता है कि उन दिनों सीटों की मंजूरी पर अधिक ध्यान नहीं दिया जा सकता था। उन्होंने कहा कि एक खास प्रोग्राम में अधिक और बिना गिनती के दाखिलों के कई मामले होते थे। सीयूईटी के बाद सीएसएएस एडमिशन सिस्टम में उम्मीदवारों द्वारा दी गई प्राथमिकताओं के आधार पर केंद्रीकृत सिस्टम के साथ दाखिला प्रक्रिया अधिक तार्किक, पारदर्शी और जवाबदेह हो गई है। अब हर स्टेकहोल्डर को, सीयूईटी स्कोर के आधार पर आवंटित, हर सीट की स्थिति के बारे में पता होता है। सीएसएएस दाखिला प्रक्रिया में हर आवंटन को सार्वजनिक किया जाता है, जिसके लिए बहुत ही वैज्ञानिक तरीका अपनाया जाता है। अ
सीट मैट्रिक्स पर विचार करें कॉलेज
प्रो. योगेश सिंह ने बताया कि आगामी शैक्षणिक सत्र को लेकर सभी कॉलेजों को यह सलाह भी दी गई है कि वे अपनी सीट मैट्रिक्स पर फिर से विचार करें और कई राउंड के आवंटन के बाद भी खाली रह गई सीटों को भरने के लिए प्रस्ताव दें। जहां तक, कॉलेज यदि अपने बीए प्रोग्राम कॉम्बिनेशन में बदलाव की संभावनाएं देखते हैं, तो डीयू यह साफ कर चुका है कि कोई भी कोर्स बंद नहीं किया जाएगा। हमारी इस कोशिश का मकसद कम से कम आवंटन राउंड में सीटों को बेहतर तरीके से भरना होगा।
