जाकिर हुसैन दिल्ली कॉलेज में राजभाषा कार्यान्वयन समिति एवं आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन प्रकोष्ठ के संयुक्त तत्त्वावधान में “डिजिटल युग में भारतीय भाषाएँ और हिंदी : चुनौतियाँ एवं अवसर” पर व्याख्यान आयोजित

जाकिर हुसैन दिल्ली कॉलेज में राजभाषा कार्यान्वयन समिति एवं आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन प्रकोष्ठ के संयुक्त तत्त्वावधान में “डिजिटल युग में भारतीय भाषाएँ और हिंदी : चुनौतियाँ एवं अवसर” 

                   

जाकिर हुसैन दिल्ली कॉलेज में राजभाषा कार्यान्वयन समिति एवं आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन प्रकोष्ठ (IQAC) के संयुक्त तत्त्वावधान में “डिजिटल युग में भारतीय भाषाएँ और हिंदी : चुनौतियाँ एवं अवसर” विषय पर एक ज्ञानवर्धक एवं विचारोत्तेजक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य डिजिटल युग में भारतीय भाषाओं एवं हिंदी की भूमिका, उनसे जुड़ी चुनौतियों तथा उपलब्ध संभावनाओं पर विचार-विमर्श करना था।

             


कार्यक्रम में मुख्य अतिथि महाविद्यालय अधिष्ठाता,प्रो. बलराम पाणी, मुख्य वक्ता अधिष्ठाता, अंतरराष्ट्रीय संबंध, प्रो. अनिल राय, महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. नरेंद्र सिंह तथा कार्यक्रम के संयोजक प्रो. हरेंद्र सिंह असवाल उपस्थित रहे।कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। इसके पश्चात् राष्ट्रगीत के साथ कार्यक्रम को आगे बढ़ाया गया। कार्यक्रम में उपस्थित अतिथियों का स्वागत एवं सम्मान किया गया। प्रो. संजय सर ने मुख्य अतिथि प्रो. बलराम पाणी सर को पुस्तक-उपनिषद व पौधा भेंट कर उनका स्वागत किया, जबकि प्रो. प्रेम कुमार सिसोदिया ने उन्हें अंगवस्त्र भेंट कर सम्मानित किया।मुख्य वक्ता प्रो. अनिल राय सर का स्वागत प्रो. मुकेश कुमार जैन ने पुस्तक-उपनिषद, पौधा एवं अंगवस्त्र भेंट देकर सम्मानित किया। वहीं, प्रो. चाव सर ने महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. नरेंद्र सिंह सर को पुस्तक-उपनिषद ,पौधा एवं अंगवस्त्र भेंट कर उनका स्वागत एवं सम्मान किया।

कार्यक्रम मे प्राचार्य प्रो. नरेन्द्र सिंह सर ने अतिथियों, प्राध्यापकगण एवं विद्यार्थियों का स्वागत करते हुए कार्यक्रम के उद्देश्य को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि राजभाषा से संबंधित कार्यक्रम केवल हिंदी से जुड़े लोगों तक सीमित नहीं रहने चाहिए, बल्कि विज्ञान, इलेक्ट्रॉनिक्स, गणित तथा अन्य संकायों से जुड़े लोगों को भी इसमें सहभागी बनाया जाना चाहिए। इससे विभिन्न विषयों की पारिभाषिक शब्दावली हिंदी से जुड़ेगी और भाषा का क्षेत्र व्यापक होगा।उन्होंने भारतीय ज्ञान-परंपरा एवं गुरु-शिष्य परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रश्न, संवाद और जिज्ञासा के माध्यम से ज्ञान का विस्तार होता है तथा गुरु और शिष्य मिलकर ज्ञान-परंपरा को आगे बढ़ाते हैं।

मुख्य अतिथि प्रो. बलराम पाणी सर ने डिजिटल युग, ज्ञान और भाषा के अंतर्संबंध पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने भारतीय ज्ञान-परंपरा के संदर्भ में डिजिटल माध्यमों की उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आधुनिक तकनीक ज्ञान के संरक्षण एवं प्रसार को सुगम बनाने में सहायक है।उन्होंने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का उल्लेख करते हुए कहा कि यह कार्य को सरल बनाने, उसकी गति बढ़ाने तथा समय बचाने में उपयोगी है। उन्होंने भाषा को संस्कृति से जोड़ते हुए कहा कि भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान का भी आधार है। अतः अपनी भाषा के प्रति सम्मान और उसके प्रति सजगता आवश्यक है।उन्होंने हिंदी के व्यापक प्रयोग की चर्चा करते हुए कहा कि भाषा के विकास के लिए उसके प्रति सम्मान, आत्मविश्वास और निरंतर प्रयोग आवश्यक है। उन्होंने आत्मनिर्भरता को भी भाषा के विकास से जोड़ा।


मुख्य वक्ता प्रो. अनिल राय सर ने भारतीय ज्ञान-परंपरा, भाषा और डिजिटल तकनीक के परस्पर संबंध पर विस्तार से विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने गुरु-शिष्य परंपरा के संदर्भ में महान गुरु एवं महान शिष्य के प्रसंगों का उल्लेख करते हुए ज्ञान के महत्त्व तथा उसके साझा किए जाने से होने वाले विस्तार को रेखांकित किया।डिजिटल तकनीक की चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि डिजिटल व्यवस्था का आधार शून्य और एक है। उन्होंने कंप्यूटर के लिए हिंदी शब्द ‘संगणक’ का उल्लेख करते हुए हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर की भूमिका को समझाया। उन्होंने कहा कि कंप्यूटर मानव द्वारा निर्मित तकनीक है और भाषा के साथ उसका गहरा संबंध है।उन्होंने भाषा को संप्रेषण की आधारभूत संरचना बताते हुए कोडिंग और डिकोडिंग के संदर्भ में भाषा की भूमिका को स्पष्ट किया। उनके अनुसार, मनुष्य अपने विचारों और भावों का संप्रेषण भाषा के माध्यम से करता है। इसके अतिरिक्त संकेत, संगीत और विभिन्न ध्वनियाँ भी संप्रेषण के माध्यम हो सकती हैं। उन्होंने भाषा के अर्जन, प्रयोग तथा उसके निरंतर अभ्यास की आवश्यकता पर भी बल दिया।हिंदी की लिपि और उसके वैज्ञानिक स्वरूप पर चर्चा करते हुए उन्होंने उच्चारण एवं लेखन के संबंध को स्पष्ट किया। उन्होंने विभिन्न भाषाओं के शब्दों और उनके उच्चारण के उदाहरण देते हुए बताया कि सही उच्चारण के लिए अभ्यास आवश्यक है तथा विभिन्न क्षेत्रों में उच्चारण की भिन्नता स्वाभाविक है।उन्होंने स्पष्ट किया कि हिंदी को अंग्रेजी से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है। भाषाएँ एक-दूसरे से शब्द ग्रहण करती हैं और परस्पर समृद्ध होती हैं। इस संदर्भ में उन्होंने गार्सा द तासी तथा फादर कामिल बुल्के जैसे विद्वानों के हिंदी संबंधी योगदान का उल्लेख किया।हिंदी की डिजिटल यात्रा पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने पुराने समय के पेजर, फैक्स तथा टंकण की कठिनाइयों का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि यूनिकोड के आने के बाद हिंदी के डिजिटल प्रयोग को नई गति मिली और कंप्यूटर तथा अन्य तकनीकी माध्यमों पर हिंदी में लिखना अधिक सुगम हुआ। उन्होंने भाषा-प्रौद्योगिकी को हिंदी के विकास का महत्त्वपूर्ण माध्यम बताया।उन्होंने कहा कि हिंदी का प्रयोग केवल हिंदी पखवाड़े तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि वर्षभर व्यवहार में होना चाहिए। उन्होंने राजभाषा से संबंधित कार्यों को केवल हिंदी विभाग तक सीमित न रखते हुए विज्ञान, गणित, वाणिज्य तथा अन्य संकायों की सहभागिता पर बल दिया, ताकि विभिन्न क्षेत्रों की पारिभाषिक शब्दावली हिंदी से जुड़े और भाषा का विकास व्यापक स्तर पर हो।उन्होंने भाषा की सहजता, सरलता और रमणीयता पर बल देते हुए कहा कि प्रभावी भाषा वही है, जिसे सामान्य व्यक्ति सहजता से समझ सके और जो अपनी अभिव्यक्ति से प्रभाव उत्पन्न करे। उन्होंने रामचरितमानस का उदाहरण देते हुए भाषा के जनसामान्य से जुड़ाव को रेखांकित किया तथा न्यायिक एवं कानूनी भाषा को भी अधिक सरल और सामान्य व्यक्ति के लिए सुबोध बनाए जाने की आवश्यकता पर बल दिया।

कार्यक्रम का समापन राजभाषा कार्यान्वयन समिति के अध्यक्ष प्रो. हरेंद्र सिंह असवाल के समापन वक्तव्य के साथ हुआ। उन्होंने कबीर के प्रसिद्ध दोहे—“संस्कृत है कूप जल, भाखा बहता नीर।”—का उद्धरण करते हुए भाषा की सहजता, सरलता, प्रवाह और व्यापकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने अपने समापन वक्तव्य में हिंदी के सहज, सरल एवं सुबोध प्रयोग पर बल दिया। उन्होंने कहा कि हम जो बोलें और लिखें, वह सामने वाले व्यक्ति के लिए स्पष्ट एवं सहज रूप से समझने योग्य होना चाहिए।उन्होंने हिंदी के व्यावहारिक प्रयोग को उसके विकास का आधार बताते हुए कहा कि हिंदी का प्रयोग केवल हिंदी विभाग तक सीमित न रहकर विज्ञान, गणित, वाणिज्य तथा अन्य सभी क्षेत्रों में होना चाहिए।कार्यक्रम में उपस्थित प्राध्यापकों एवं विद्यार्थियों की सक्रिय सहभागिता ने इसे सार्थक एवं जीवंत बनाए रखा। अंत में कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान के साथ हुआ।



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