विज्ञापन बाज़ार की शक्ति, उत्पाद के लिए भक्ति

 विज्ञापन बाज़ार की शक्ति, उत्पाद के लिए भक्ति 

                    आवश्यकता अविष्कार की जननी है । दिन -व –दिन बढ़ते औद्योगीकरण तथा हाड़ तोड़ व्यवसायिक प्रतिस्‍पर्धा के इस दौर में विज्ञापन का विशेष  स्थान हो गया है । विज्ञापन वास्तव में उपभोक्ता तक विचार, संदेश तथा वस्‍तु को पहुंचाने का माध्यम है । विज्ञापन शब्द ‘ वि और ज्ञापन इन दो शब्दों से मिलकर बना है । वि से तातार्य विशेष तथा ज्ञापन से आशय ज्ञान कराना अथवा सूचना देना है । अँग्रेजी में इसके लिए एडवरटिजमेंट शब्द का इस्तेमाल होता है जो कि  लैटिन भाषा के एड्वर्टर  शब्द से बना है जिसका अर्थ है ‘ मस्तिष्क का केंद्रीभूत होना । वास्तव में विज्ञापन का मूल उद्देश्य जन –सामान्य के दिमाग को किसी सामग्री या सेवा की ओर मोड़ना अर्थात टू टर्न टू । आज जब हर रोज बाज़ार में नयी वस्तुए आ जाती है तो ऐसे में किसी एक वस्तु को टिके रहने के लिए विज्ञापन ही एक मात्र रास्ता बचता है । मान लिजिये यदि कोई वस्तु गुणवत्ता में सुधार नहीं करती और उसका विज्ञापन नया बना देती है तो उस वस्तु की विक्री में बढ़ोत्तरी हो जाती है  कारण गुणवत्ता में सुधार नहीं बल्कि विज्ञापन है । इसका उदाहरण है- एयर इंडिया और लाइफ ब्याय । इन दोनों समूह के कर्ताधर्ताओं को केवल विज्ञापन के जरिये ग्राहको को अपनी ओर खींचने में सफलता मिली । एयर इंडिया को लेट लतीफी और सुस्त सेवा के तमगे से बाहर निकालने वाली विज्ञापन “बदले –बदले मेरे अंदाज़ नज़र आते हैं “ फिल्म चौदहवी का चाँद फिल्म के गीत ‘ बदले -बदले मेरे सरकार नज़र आते हैं, आधारित गीत था जो जनता के दिमाग में रची बसी थी जिसका मनोवैज्ञानिक लाभ एयर इंडिया को मिला । लाइफ ब्याय साबून जब बाज़ार में आया तो यह उतना उल्लेखनीय व्यवसाय नहीं कर सका । निर्माताओ ने इसे बंद करने का निर्णय लिया ।  बहुत खोजने के बाद निर्णय लिया गया कि इस साबून में डेटॉल की गंध है इसलिए इसकी मांग नहीं बढ़ रही है । विशेषज्ञो की बैठक हुई ,निर्णय निकला की इसके गंध को स्वास्थ्य से जोड़ा जाये  और स्लोगन निकाला गया –लाइफब्याय है जहाँ, तंदुरुस्ती है वहाँ “। आज भी लाइफ़्ब्याय गाँव के लोगो के लिए लाइफ लाइन है। एकमात्र साबुन है जिसे नहाने और धोने दोनों के काम में लिया जाता है।  


“तुम बिन और न दूजा” 

विज्ञापन का मूल उद्देश्य सिर्फ मुनाफा कमाना रहा है। उसके मूल में केवल और केवल उत्पाद के लिए मोह होता है । उसकी सारी संरचना वस्तु की सकरात्मक व्यख्या के इर्द –गिर्द निर्मित होती है। बाज़ार के लिए  विज्ञापन वैसे ही है जैसे भक्त के लिए भगवान । विज्ञापन  के लिए उत्पाद के प्रति भक्ति से बड़ा कोई उद्देश्य नहीं  रहा है ।  उसे सिर्फ सामान बेचने से मतलब  होता है ।वो सिर्फ इस अवधारणा को मानता है कि ‘ जब से तूने मुझे दीवाना बना रखा है, संग हर शख्स ने हाथों पर उठा रखा है.., । उसका दूसरा सिद्धान्त है तुम बिन और न दूजा,तुम बिन और न दूजा,आस करूं मैं जिसकी।  हजारो स्वास्थ्य को हानि पहुंचाने वाली वस्तु केवल  केवल इसलिए बाज़ार में बिक रही है कि उसके बेचने वाले बाज़ार में स्थान बनाए लोग है ,जिनकी बाज़ार पर पकड़ है । अस्सी के दशक में दूरदर्शन का मशहूर विल्स सिगरेट का एड जिसकी टैग लाइन थी मेड फॉर ईच अदर इसके एड का इस दशक के युवाओं में बड़ा क्रेज था  ।  नब्बे के दशक में अक्षय कुमार रेड एंड व्हाइट सिगरेट के एड करने की वजह से इसकी विक्री में बढ़ोत्तरी हुई क्यूंकी इसके विज्ञापन में मानो यह भाव भर दिया गया कि रेड एंड व्हाइट ही बहादुरी का आधार है। इसका शीर्षक कुछ इस तरह था  “ हम रेड एंड व्हाइट पइने वालो की बात ही कुछ और है “,।दो हज़ार के दशक में आयी फिल्मों में सिगरेट ट्रेड मार्क बन गया । अजय देवगन की फिल्म कयामत में अजय देवगन हर वक़्त हाथ में सिगरेट लिए नज़र आते हैं मानों उनकी शक्ति  हीं सिगरेट है । ऐसे बहुत सारे विज्ञापन है जो बाज़ार के अनुकूल भक्ति में लगे हैं जो यह जानते हैं कि इससे इसके इस्तेमाल करने वालों को खतरा है । इसका मूल कारण दुनिया भर में सामान को बेचना है । खुले बाज़ार और ऑनलाइन बाज़ार ने इसको और कठिन बना दिया है । ऐसे में केवल विज्ञापन ही सहारा है । इसलिए कहा गया कि आज के युग में  विज्ञापन बाज़ार का आधार है और उसके लिए ये उक्ति साकार है कि-  “शरण गहूं किसकी,स्वामी शरण गहूं मैं किसकी ।

तुम बिन और न दूजा,

तुम बिन और न दूजा,

आस करूं मैं जिसकी ॥


तेरा तेरा पीछा ना मैं छोड़ूंगा सोनिये

   विज्ञापन का मनोविज्ञान बिलकुल इस गाने के बोल की  तरह है -  तेरा पीछा ना मैं छोड़ूंगा सोनिये पीछा ना मैं छोड़ूंगा सोनिये। जी हाँ बाज़ार आज  विज्ञापन के जरिये घर बाहर ,माल, हौल ,मोबाइल ,टी.वी.,अखबार सबके जरिये ख़रीददार का  पीछा कर रहा है।इसका मुख्य कारण यह है कि  एक शोध के अनुसार औसत व्यक्ति हर रोज दस हज़ार से अधिक विज्ञापनो से गुजरता है और औसत एकाग्रता आठ से दस सेकंड की है। ऐसे में जनमानस में अपने वस्तु  को बेचने के लिए विज्ञापन के जरिये उसका मन; स्थिति को काबू करने की कोशिश करता है । इसके लिए वो उन सभी हथियारो का इस्तेमाल करता है जो व्यक्ति को उसके निर्माण की ओर आकर्षित करने में सहायता कर रहा है । वो हर वस्तु को बेचने के लिए महिलाओं को आगे करता है, उसकी खूबसूरती के जरिये वो शेविंग क्रीम से लेकर सीमेंट तक बेच रहा है । युवाओं को लुभाने के लिए कई ऐसे एड बनाए गए हैं जिनका हमारी सामाजिक संरचना और समाज में जगह नहीं है । डियो के ऐसे कई एड है जिनमें युवक युवतियों के आकर्षण और करीब आने की वजह हीं डियो की सुगंध रही है । ऐसे विज्ञापन देखते –देखते युवा मानस मान लेता है कि किसी को आकर्षित करने के लिए डियो लगाना जरूरी है। भारतीय समाज में  विवाह संस्था को उच्च स्थान मिला हुआ है डियो के एड के जरिये उसकी जड़ में एसिड डालने का काम किया गया जहाँ एक नवविवाहिता डियो की खुशबू  से इतनी ज्यादा उत्तेजित हो जाती है कि वो सारी मर्यादा भूल जाती है । भले ही इसका उद्देश्य डियो बेचना रहा हो पर इस एड के दूरगामी मनोविज्ञान को समझे तो यह नए किस्म के कॉस्मो cosmopolitan संबंध की ओर इशारा करता हैं जहाँ कोई बंधन नहीं है । संबंध का आधार केवल क्षणिक मनोविज्ञान है । विज्ञापन ऐसे छोटे क्षणों का इस्तेमाल बड़े मनोवैज्ञानिक ढंग से करता है । जहाँ डियो के एड में उत्तेजक होता है, वहीं चॉकलेट बेचते समय भावुक हो जाता है । उसकी भाषा नरम हो जाती है,उसकी निर्मिति संस्कारी हो जाती है। उसे जब बिजली का तार बेचना होता है तो उसकी जड़ में बा-बेटी के संबंध और अभाव के जरिये दर्शक को भावुक करता है । 

'बात को कील की तरह ठोंकना' 

कहते हैं किसी को मारना हो तो सबसे पहले उसकी भाषा को मार दो। विज्ञापन व्यक्ति  को अपनी सोच, अपनी भाषा से अलग कर अपनी बात मानने को मजबूर करता है । वो ऐसी भाषा गढ़ता है जिससे खरीददार की  सोच में बदलाव आ जाता है। ‘सर्फ’,रिन, कॉलगेट के  एड का समाज में इतना मनोवैज्ञानिक दवाब था कि किसी को अगर सर्फ के अलावा कोई भी दूसरे ब्रांड का डिटेर्जेंट भी लेना होता था तो सर्फ दे दो कह कर ही मांगता था । यही हाल कुछ रिन साबुन और कॉलगेट को लेकर भी था । इस मनोविज्ञान को चुनौती देने के लिए दूसरे वस्तु निर्माताओं को बडी मशक्कत लगी । सर्फ को भाषा के बदौलत चुनौती मिली घड़ी डिटेर्जेंट के एड से जब स्लोगन आया, “पहले इस्तेमाल करें, फिर विश्वास करें, इसी तरह कॉलगेट को चुनौती मिली बबूल के एड ,बबुल-बबुल...वसूल । आमिर खान के एड ने दर्शको के दिमाग में बैठा दिया कि ठंडा मतलब कोका –कोला । शाहरुख ने लोगों के दिमाग में ठूँसा- डर्मिकूल ठंडा –ठंडा,छोटा ए. सी. घर ले आए और ये दिल मांगे मोर। इन सभी एड का लगातार टेलीविजन सेट के जरिये दिन भर में कई –कई बार लगातार देखे जाने के कारण लोगों के जेहन में बैठ गया । इन एड ने न केवल जन मानस के मनोविज्ञान को बदला बल्कि जो मौजूद भाषा थी, जो मनोविज्ञान था जन मानस का उसको भी बदल कर रख दिया ।बाज़ार के लिए इस कील ठुकी भाषा ने नए द्वार खोल दिये तो  एड की इस कीलनुमा भाषा ने रूढ़िग्रस्त समाज को चुनौती भी दी । स्त्री केवल जैविक सत्ता नहीं ,उसकी सामाजिक सत्ता भी है इसका भी एहसास कराया । कई स्लोगनों  जैसे , ‘लड़कियां लड़कों से कम नहीं, बेटी बचाओ, बेटी पढाओ, पढ़ेगा इंडिया, तभी बढ़ेगा इंडिया, ने हीं ग्रंथि को निकाल लड़कियों की शिक्षा के लिए समाज को जागरूक भी बनाने का कार्य किया । 


लेखक 

सुधांशु अनिरुद्ध

संपादक, टॉकिंग न्यूज 24 x 7


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