आजादी के गुमनाम सितारे 'त्याग मूर्ति स्वामी ब्रह्मानंद'

 आजादी के गुमनाम सितारे 'त्याग मूर्ति स्वामी ब्रह्मानंद' 

       

 दिल्ली से महज 500 किलोमीटर दूरी पर उत्तर प्रदेश के राठ, बुंदेलखंड में 'बुंदेलखंड बहुजन महोत्सव' त्याग मूर्ति स्वामी ब्रह्मानंद की स्मृति में मनाया गया। वहाँ जाने के बाद स्वामी जी के बारे में बहुत कुछ जानने का मौका मिला । जिसे इतिहासकारों ने बिसार दिया है। ब्रह्मानंद स्वतंत्रता सेनानी ही नहीं शिक्षा और सामाजिक जागरण के पुरोधा थे। आजादी की लड़ाई इन्होंने महात्मा गाँधी, जवाहरलाल नेहरू, गणेश शंकर विद्यार्थी, राधा मोहन गोकुल, बाबा राघवदास जैसे महापुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर की और जेल भी गए। 

                                   शिक्षा के क्षेत्र में अलख जागने का कार्य बुंदेलखंड के ग्राम इटौरा राठ में एक पाठशाला खोलकर की। तत्पश्चात खोही ( वर्तमान में महोबा जिला) स्थान पर कनकुआ के जमींदार वृंदावन सिंह लोधी 'रईस' से दान में ले गई जमीन पर पाठशाला की शुरुआत की। हालांकि पाठशाला स्वतंत्रता सेनानियों के पनाहगाह होने की वज़ह से ब्रिटिश हुकूमत द्वारा बंद कर दी गई। सन् 1938 में स्वामी जी ने कांग्रेस के राष्ट्रीय नेताओं की एक कॉन्फ्रेंस जराखर गाँव में आयोजित की। जिसमें पाँच हजार चांदी के सिक्के बच गए। जिसको तत्कालीन हमीरपुर जिलाधिकारी सैयद सिद्दीकी हसन के सहयोग से राठ में ब्रह्मानंद इंटर कॉलज की नींव रखी । सन् 1960 में कृषि शिक्षा के लिए महाविद्यालय की स्थापना की । उनके प्रयासों से बुंदेलखंड में शिक्षा की नई लहर की शुरुआत हुई । 


ब्रह्मानंद का पालन पोषण शुद्र समाज  की एक मेहतरानी महिला द्वारा हुआ। दरअसल, तत्कालीन सामाजिक मान्यता के अनुसार बच्चों को महामारी से बचने के लिए अछूत जाति की महिला के गोद में बच्चों की रखे जाने की प्रथा थी। स्वामी जी उसे महिला को आजीवन माँ मानते रहे। जिसका विरोध गांव के लोग करते थे। इस तरह के विरोध का स्वामी जी ने डटकर सामना किया। उनका मानना था कि "जब आप सभी को अपने बच्चों को बचाना हो तो शूद्र महिलाओं के गोद में डाल दो, इसके बाद वह बच्चा बच जाता है तो उसे छुआछूत सिखाया जाने लगता है! मैं समाज के ऐसे स्वार्थी मनोदशा का विरोध करता हूँ और संपूर्ण मानव जाति को एक मानता हूँ।" छुआछूत जैसे सामाजिक कलंक के वे आजीवन विरोध करते रहें।


ऐसे महापुरुष को भारतीय इतिहासकारों ने इतिहास में कहीं जगह नहीं दी! वैसे इस देश की आवाम महात्मा गाँधी और बाबा साहब अंबेडकर को भूलती रही है तो स्वामी जी को भुलाना कोई नई बात नहीं है! स्वामी जी का जन्म 4 दिसंबर 1894 को उत्तर प्रदेश हमीरपुर के बेतवा नदी के किनारे तहसील सरीला के बरहरा गाँव में 'लोधी' जाति के साधारण किसान परिवार  में हुआ। इनके पिता का नाम मातादीन लोधी और माता यशोदाबाई  है। उनके बचपन का नाम शिवदयाल था। इनकी प्रारंभिक शिक्षा गाँव में ही संपन्न हुई। यद्यपि इनका विवाह 9 वर्ष की अल्पायु में ही राधाबाई से करा दी गई। तथापि महज़ 23 वर्ष की आयु में सन्यास धारण कर ली।

सन्यासी के रूप में वे 12 वर्षों तक भारत भ्रमण करते रहे। इस दौरान हिंदुस्तान की आवाम को समझने की कोशिश की। और पाया कि हिंदुस्तान की बदहाली की मुख्य वजह अशिक्षा है। लिहाजा अशिक्षा को दूर करने का बेड़ा उठाया। सांसद रहते हुए जो भी उन्हें धन प्राप्त हुआ पाई-पाई शिक्षा के लिए अर्पित कर दी। 


स्वाधीनता संग्राम के दौरान सन् 1921 में ब्रह्मानंद की मुलाकात पंजाब के भटिंडा में महात्मा गाँधी से हुई। इस मुलाकात से गाँधी जी ब्रह्मानंद से बहुत प्रभावित हुए और कहा कि " यदि आप जैसे सौ संत मिल जाए तो देश शीघ्र ही दस्ता से मुक्त हो जाएगा।" महात्मा गाँधी के इस कथन ने ब्रह्मानंद के जीवन पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाला जिसकी वजह से वह बुंदेलखंड में अंग्रेजों की एट से एट बजाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। 1928 में महात्मा गाँधी के साथ मिलकर विदेशी वस्त्रो का दहन किया। सन् 1930 उसके नमक आंदोलन में शामिल होकर गिरफ्तार हुए और सन् 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भूमिका का निर्वाह करते हुए कई दफे जेल भी गए। स्वामी ब्रह्मानंद अपने राष्ट्रीय और सामाजिक भावना की अभिव्यक्ति करते लिखते हैं.  

" मर जाऊं मांगू नहीं अपने तन के  काज,

परमारथ के करनै मोहि न आवै लाज।" 

ब्रह्मानंद यही रुकते नहीं है आजादी के बाद महात्मा गाँधी के अधूरे कार्य को आगे बढ़ते हुए सन् 1966 में गौ- हत्या आंदोलन के जनक और नेता बने। जिसमें प्रयाग से दिल्ली तक उन्होंने पैदल यात्रा की। जिससे तात्कालिक भारत सरकार घबरा गई और उन्हें जेल में डाल दी। गौ हत्या के खिलाफ उनके समर्पण भाव को उन्हीं की जुबानी समझा जा सकता है। वे कहते हैं " गौ-वंश की रक्षा के लिए मैं सब प्रकार के त्याग करने को तैयार हूँ । यहां तक की अपनी प्राणों की आहुति भी दे दूंगा।" इसका अर्थ यह नहीं कि वह जनसंघ के विचारधारा से जुड़े। वे सच्चे अर्थों में भारत माँ के लाल थे। भारतीय संसद के पहले गेरुआ वस्त्र धारी सांसद थे जिन्होंने अपना पूरा जीवन सन्यासी की तरह बिताते हुए देश और समाज की सेवा की। ऐसे महान स्वामी ब्रह्मानंद के बारे में बुंदेली कवि हरगोविंद सिंह लिखते हैं 

 "त्याग मूर्ति कर्मठ यती, स्वामी ब्रह्मानंद

जिनके विद्या कुंज कौफ ,लो ज्ञान मकरंद"



लेखक 

डॉ लवकुश कुमार 

सहायक प्रोफेसर 

कालिंदी महाविद्यालय 

दिल्ली विश्वविद्यालय 

संपर्क-luvkush@kalindi.du.ac.in

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