कुंभ मेला : ऐतिहासिक परंपरा और महत्व
कुंभ की परम्परा और संस्कृति
कुंभ मेला दो शब्दों कुंभ और मेला से बना है. कुंभ नाम अमृत के अमर पात्र या कलश से लिया गया है जिसे देवता और राक्षसों ने प्राचीन वैदिक शास्त्रों में वर्णित पुराणों के रूप में वर्णित किया था. मेला, जैसा कि हम सभी परिचित हैं, एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है 'सभा' या 'मिलना' । कुंभ मेला दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक सम्मेलन है जिसे "धार्मिक तीर्थयात्रियों की दुनिया की सबसे बड़ी मंडली" के रूप में भी जाना जाता है.कुंभ मेले का पहला लिखित प्रमाण भागवत पुराण में उल्लिखित है. कुंभ मेले का एक अन्य लिखित प्रमाण चीनी यात्री ह्वेन सांग के कार्यों में उल्लिखित है, जो हर्षवर्धन के शासनकाल के दौरान 629-645 ईस्वी में भारत आया था.दुनिया की सबसे बड़ी सभा कुंभ मेले को यूनेस्को की प्रतिनिधि सूची 'मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत' में शामिल किया गया है.गांधीजी महाकुंभ संबंधी अपने एक लेख में लिखते हैं, 'मेरे लिए वह घड़ी धन्य थी, लेकिन मैं तीर्थयात्रा की भावना से हरिद्वार नहीं गया था। पवित्रता आदि के लिए तीर्थ क्षेत्र में जाने का मोह मुझे कभी नहीं रहा। फिर भी मेरा ख्याल था कि 17 लाख यात्रियों में सभी पाखंडी नहीं हो सकते। यह कहा जाता था कि मेले में 17 लाख लोग इकट्ठे हुए थे। मुझे इस विषय में कोई संदेह नहीं था कि इनमें असंख्य लोग पुण्य कमाने के लिए और स्वयं को शुद्ध करने के लिए आए थे।अनंतपुर के राजा रामदत्त लिखते हैं, 'भारतीय संस्कृति के मूल में जो परम सत्य निहित है, कुंभ मेला के मूल में भी उसी सत्य के दर्शन होते हैं। इसी कारण कुंभ इतने स्थिर और निश्चिंतता के भाव से चला आ रहा है। यह सच है कि कुंभ के लिए भीड़ जुटाने का कोई उद्यम नहीं होता, विज्ञापन की जरूरत नहीं पड़ती, निमंत्रण नहीं दिया जाता, फिर भी धनी-निर्धन, छोटे-बड़े विरक्त और गृहस्थ लाखों की संख्या में 'हर-हर गंगे' का जयघोष करते हुए पर्व पर इकट्ठे हो जाते हैं।
कुंभ भारतीय सनातन संस्कृति का प्रतीक
कुंभ का मेला भारत की सनातन धर्म संस्कृति का प्रतीक है। महाकुंभ का मेला भारत ही नहीं अपितु विश्व की सबसे सुदीर्घ धार्मिक सांस्कृतिक परंपरा है । इतिहास में कुंभ के मेले का उल्लेख कई बार मिलता है। जब सूर्य मेष राशि और ब्रहस्पति कुंभ राशि में प्रवेश करते हैं तब कुंभ मेले का आयोजन हरिद्वार में किया जाता है.-जब सूर्य और वृहस्पति का सिंह राशि में प्रवेश होता है तब यह महाकुंभ मेला नासिक में मनाया जाता है।जब वृहस्पति सिंह राशि में और सूर्य देव मेष राशि में प्रवेश करते हैं तब कुंभ मेले का आयोजन उज्जैन में किया जाता है. यहीं आपको बता दें कि जब सूर्य देव सिंह राशि में प्रवेश करते हैं, इसी कारण उजैन, मध्यप्रदेश में जो कुंभ मनाया जाता है उसे सिंहस्थ कुंभ कहते हैं।
कुंभ का इतिहास :
कुंभ मेले का इतिहास कम से कम साढ़े आठ सौ साल पुराना है।मान्यता है कि इस मेले की शुरआत आदि शंकराचार्य ने की थी। पौराणिक कथाओं के अनुसार कुंभ की शुरुआत समुद्र मंथन के आदिकाल से ही हो गई थी। शास्त्रों में बताया गया है कि पृथ्वी का एक वर्ष देवताओं का दिन होता है, इसलिए हर बारह वर्ष पर एक स्थान पर पुनः कुंभ का आयोजन होता है। देवताओं का बारह वर्ष पृथ्वी लोक के 144 वर्ष के बाद आता है। ऐसी मान्यता है कि 144 वर्ष के बाद कहते हैं कुंभ मेले का कहानी समुद्र मंथन से जुड़ी है। कहा जाता है कि एकबार महर्षि दुर्वासा के श्राप के कारण जब इंद्र और देवता कमजोर पड़ गए, तब राक्षस ने देवताओं पर आक्रमण कर उन्हें पराजित कर दिया । सब देवता मिलकर भगवान विष्णु के पास पहुंचे और उन्हें पूरी बात बताई । तब भगवान विष्णु ने देवताओं को दैत्यों के साथ मिलकर क्षीर सागर का मंथन करके अमृत निकालने की सलाह दी। भगवान विष्णु के ऐसा कहने पर संपूर्ण देवता राक्षसों के साथ संधि करके अमृत निकालने के प्रयास में लग गए। समुद्र मंथन से अमृत निकलते ही देवताओं के इशारे पर इंद्र पुत्र 'जयंत' अमृत कलश को लेकर आकाश में उड़ गया। राक्षसों ने अमृत लाने के लिए जयंत का पीछा किया और कठिन परिश्रम के बाद उन्होंने बीच रास्ते में ही जयंत को पकड़ा और अमृत कलश पर अधिकार जमाने के लिए देव और दानव में 12 दिन तक भयंकर युद्ध होता रहा।मंथन में निकले अमृत का कलश हरिद्वार, इलाहबाद, उज्जैन और नासिक के स्थानों पर ही गिरा था, इसीलिए इन चार स्थानों पर ही कुंभ मेला हर तीन बरस बाद लगता आया है। 12 साल बाद यह मेला अपने पहले स्थान पर वापस पहुंचता है। यही कारण है कि कुंभ के मेले को इन्हीं चार स्थानों पर मनाया जाता है।
कुंभ को 4 हिस्सों में बांटा गया है। जैसे अगर पहला कुंभ हरिद्वार में होता है तो ठीक उसके 3 साल बाद दूसरा कुंभ प्रयाग में और फिर तीसरा कुंभ 3 साल बाद उज्जैन में और फिर 3 साल बाद चौथा कुंभ नासिक में होता है। स्वर्ग में भी कुंभ का आयोजन होता है इसलिए उस वर्ष पृथ्वी पर महाकुंभ का अयोजन होता है। कुंभ मेला (पवित्र घड़े का उत्सव) पृथ्वी पर तीर्थयात्रियों का सबसे बड़ा शांतिपूर्ण समागम है, जिसके दौरान प्रतिभागी पवित्र नदी में स्नान करते हैं या डुबकी लगाते हैं। भक्तों का मानना है कि गंगा में स्नान करने से व्यक्ति पापों से मुक्त हो जाता है और जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाता है। बिना किसी आमंत्रण के लाखों लोग इस स्थान पर पहुंचते हैं। समागम में तपस्वी, संत, साधु, आकांक्षी-कल्पवासी और आगंतुक शामिल होते हैं। यह उत्सव इलाहाबाद, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक में हर चार साल में बारी-बारी से आयोजित किया जाता है और इसमें जाति, पंथ या लिंग के बावजूद लाखों लोग शामिल होते हैं। हालांकि, इसके मुख्य आयोजक अखाड़ों और आश्रमों, धार्मिक संगठनों या भिक्षा पर रहने वाले व्यक्ति होते हैं। कुंभ मेला देश में एक केंद्रीय आध्यात्मिक भूमिका निभाता है, जो आम भारतीयों पर एक मंत्रमुग्ध प्रभाव डालता है। यह आयोजन खगोल विज्ञान, ज्योतिष, अध्यात्म, अनुष्ठानिक परंपराओं और सामाजिक और सांस्कृतिक रीति-रिवाजों और प्रथाओं के विज्ञान को समाहित करता है, जो इसे ज्ञान में बेहद समृद्ध बनाता है। चूंकि यह भारत के चार अलग-अलग शहरों में आयोजित किया जाता है, इसलिए इसमें विभिन्न सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियाँ शामिल होती हैं, जो इसे सांस्कृतिक रूप से विविधतापूर्ण त्यौहार बनाती हैं।
कुंभ जैसे आयोजन लोगों को ईश्वर से सीधे संपर्क में लाने में मदद करते हैं। किसी मध्यस्थ की जरूरत नहीं है। आजादी के बाद से इस मेले में दिन व दिन परिवर्तन हुए है। 1954 में चालीस लाख लोगो की उपस्थिति वाला मेला 2013 में 8 करोड़ लोगों की उपस्थिति के साथ विश्व की सबसे अद्भुत मेलों में से एक है। वर्षो से आयोजित हो रहे इस आयोजन को लेकर सन 42, मदन मोहन मालवीय ने कहा था कि इतने बड़े आयोजन के लिए दो पैसे के पंचांग के अलावा किसी प्रचार या नियंत्रण की जरूरत नहीं होती। लोग खुद ब खुद खींचे चले आते हैं।
कुंभ बदल गया
आज कुंभ के स्वरूप में तकनीक, सुविधा और सुरक्षा सभी चीजे मौजूद रहती हैं। देश विदेश की संस्कृति का अद्भुत संगम मौजूद रहता है। दुनिया भर से विदेशी सैलानी इस मेले में आकर इसकी भव्यता और दिव्यता को अपने दिल और दिमाग में कैद कर दुनिया के दूसरे हिस्से में पहुंचाने को उत्सुक और लालायित रहते हैं।कुंभ मेला का आयोजन सदियों से होता आ रहा है लेकिन हाल के दशकों में इसने बहुत बड़ा रूप ले लिया है. 2019 में आयोजित अर्धकुंभ जो 49 दिनों का आयोजन था के बारे में कहा जाता है कि उसमे ब्रिटेन और स्पेन की कुल आबादी जितनी संख्या में यहां लोगों के पहुंचे थे ।
अब इस मेले में तीर्थ यात्रियों के लिए जरूरी चीजों के साथ उन्हे सस्ते दर पर राशन पानी भी मुहैया कराया जाता है। उनके लिए विशेष प्रकार के कार्ड भी बनाए जाते है जिसको दिखाकर सस्ती रसद ले सकते हैं। चारो तरफ, सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम, के बीच समन्वय और संस्कृति का अद्भुत संगम ही कुंभ है जहां सचमुच स्वर्ग जैसा नजारा रहता है। जहां मानव का सिर्फ मानव से नाता होता है। आज जब सब तरफ क्लेश और द्वेष बढ़ रहा है ऐसे में कुंभ संदेश देता है कि रंगरूप, भेषभूषा चाहे अनेक हो पर हम सबको एक हो कर रहना है। एक साथ चलना है। यह मेला केवल मेला नही बल्कि संदेश है साहचर्य का सौहार्द्र का और सांस्कृतिक समन्वय का।
अनिरूद्ध कुमार सुधांशु
